Tuesday, 22 July 2014

दुनिया


दुनिया ये हो गयी है बड़ी ही गजब,
हर वक़्त एक दौड़ में लगे हुए हैं सब,
खुशियां नहीं है चाहता कोई यहाँ पर,
पैसे की भूख में फिरते हैं दर-बदर,
कल की चिंता में परेशानियां बढ़ी,
आज की खुशियों का राह रोक कर खड़ी,
बड़ी-बड़ी चीजों के पीछे सब भागे,
दिन में सोते और रात में जागे,
टूटे पत्तों सी बिखरी जिंदगी,
जाने किसकी है ये बंदगी,
खुद की नहीं, दुनिया की करें फ़िकर,
अरे क्या फायदा ऐसे डर-डर के जी कर ,
अपनी ही परछाइयों का पीछा करते हम,
ये सिलसिला चलता रहे जब तक ना निकले दम,
दिल चाहे कुछ, हम उल्टा ही करते,
सपनों की तलाश में सपने ही मरते,
कहीं ऐसा न हो जाये जिंदगी का सबब,
अंत में मौत भी आ कर बोले - तू जिया कब ?